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अरहर की खेती
किस्में भूमि व खेत की तैयारी उर्वरक प्रयोग
बुआई का तरीका बीजउपचार सिंचाई
निराई गुड़ाई पौध संरक्षण कटाई एवं पैदावार

अरहर कम सिंचाई वाले तथा बरनी क्षेत्रों के लिए बहुत उपयोगी फ़सल है।इसे मिश्रित फ़सल के रूप में किसी अन्य फ़सल के साथ बोकर अतिरिक्त लाभ लिया जा सकता है।दलहनी फ़सल होने के कारन यह भूमि की उर्वरा शक्ति को भी बढाती है।

उत्तम किस्में

टी 21

प्रभात

ग्वालियर

आई. सी. पी. एल. - 151

एस. सी. पी. एल. - 87

यु. पी. ए. एल. - 120

पारस
मानक ( एच. 77-216)

भूमि व खेत की तैयारी

अरहर की जड़ें मिटटी में काफी गहराई तक जाकर पोषक तत्त्व ग्रहण करती हैं।अतः गहरी अच्छे जल निकास वाली भूमि इसके लिए उपयुक्त रहती है।उथली व जल भराव वाली मिटटी में इसकी खेती सफलतापूर्वक नहीं की जा सकती है।वर्षा प्रारम्भ होते ही जमींन को तीन चार बार हल से जोत लीजिये।पहली जुती मिटटी पलटने वाले हल से तथा बाद में देशी हल या ट्रैक्टर , कल्टीवेटर या हीरो से जुताई करें।जुताई करते समय यह ध्यान रखें कि ढेले टूट जायें जिससे भूमि में ज्यादा जल संग्रह नहीं हो सके।

उर्वरक प्रयोग

अरहर कि बुआई के समय 50-60 किलो फ़ॉस्फ़ेट तथा 156-20 किलो नाइट्रोजन प्रति हेक्टेअर ऊर कर दीजिये।इसकी फ़सल में प्रायः गोबर या कम्पोस्ट खाद नहीं देनी चाहिए।

बुआई का तरीका

बीज कि मात्रा एवं बुआई

इसकी बुआई मई से प्रारम्भ होकर अगस्त तक चलती है।देर से बोई गई फ़सल हमेशा रोग व कीट से प्रभावित होती है।अतः उपयुक्त समय पर बुआई करें।बुआई का उपयुक्त समय मध्य जून से जुलाई तक है।

अकेली फ़सल के लिए 15-20 किलो तथा मिश्रित फ़सल के लिए करीब 6-7 किलो बीज प्रति हेक्टेअर आवश्यकता रहती है।बीजों को राईजोबियम एवं पी. एस. बी. कल्चर से उपचारित करके बोयें।

बीज को ऊरकर बोयें।ध्यान रखें बीज 5 सेंटीमीटर से ज्यादा गहरा नहीं गिरे।बुआई के समय उपयुक्त नमी का होना आवश्यक है।
अरहर कि क़तार से क़तार कि दूरी भूमि की उर्वरा शक्ति तथा साथ में उगी जाने वाली फ़सल पर निर्भर है, साधारणतया अरहर की शीघ्र पकने वाली क़िस्मों की कतारों के बीच की दूरी 40-50 सेंटीमीटर तथा देर से पकने वाली क़िस्मों की दूरी 50-60 सेंटीमीटर रखें।

उदयपुर व कोटा खंड में प्रभात क़िस्म के लिए क़तार से क़तार की दूरी 30 सेंटीमीटर व ग्वालियर 3 क़िस्म के लिए 60 सेंटीमीटर की दूरी रखें।

बीज उपचार  

3 ग्राम थाइरम प्रति किलो बीज के दर से बीज को उपचारित करें।

सिंचाई

अरहर अधिकतर बारानी फ़सल के रूप में बोयी जाती है परन्तु आवश्यकतानुसार जहाँ सिंचाई के साधन उपलब्ध हों वहां इसे एक या दो सिंचाई देना लाभदायक रहता है।वर्षा न हो तो पहली सिंचाई फ़सल की प्रारंभिक अवस्था में ही करें।दूसरी सिंचाई सर्दी में फूल व फल लगते समय करिए, इससे फ़सल पाले के नुकसान से भी बच सकेगी।

गंगानगर खंड में बुआई के 30-40 दिन बाद पहली एवं 70-80 दिन बाद दूसरी सिंचाई करें।वर्षा के अभाव में तीसरी सिंचाई सितम्बर अंत तक करें।अक्टूबर के पहले सप्ताह के बाद सिंचाई नहीं करें क्योंकि फ़सल पकने में देर होने के कारण रबी फ़सल की बुआई में देर होगी।.

निराई गुड़ाई  

प्रारंभिक अवस्था से ही खेत से खरपतवारों को निकलते रहें।जब फ़सल 3 - 4 सप्ताह की हो जाए तब कतारों में से अतिरिक्त पौधों को उखाड़ कर पौधे से पौधे की दूरी, क़िस्म के आधार पर 23 से 35 सेंटीमीटर कर लीजिये।

अरहर बुआई का उपयोग मिश्रित फ़सल के रूप में करने से कतारों के बीच में छूटने वाली जगह का उपयोग हो जाता है तथा किसान को अतिरिक्त आमदनी मिल जाती है।प्रारंभिक अवस्था में यह फ़सल बहुत ही धीरे धीरे बढती है इसलिए इसके पकने से पहले कोई शीघ्र पकने वाली व उथली जड़ों वाली फ़सल ले सकते हैं।इसी प्रकार छाया चाहने वाली फसलें जैसे - हल्दी, अदरक इत्यादि जहाँ बोई जाती है, को भी इसके साथ मिश्रित फ़सल के रूप में बो सकते हैं।

अरहर अगर मिश्रित फ़सल के रूप में बोई गई है तो साथ में ली गई मिश्रित फ़सल की कटाई के तुंरत बाद अरहर की कतारों के बीच में हल या हैरो चलायें।यह क्रिया अरहर की बढोत्तरी में सहायक होती है।

पौध संरक्षण

दीमक
जहाँ दीमक लगती हो वहां बुआई से पहले 4 प्रतिशत एन्डोसल्फान या 1.5 प्रतिशल क्युनाफास चूर्ण 25 किलो प्रति हेक्टेअर की दर से भूमि उपचार करें।

लाल लट
प्रारंभिक अवस्था में अरहर के बढ़ते हुए पौधों की पत्तियों को लाल बल वाली लट खाती है।फ़सल को बचने के लिए एन्डोसल्फान 4 प्रतिशत या क्युनाफास 1.5 प्रतिशत या मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण 20-25 किलो या 1-1.5 लीटर एन्डोसन 35 एस सी या क्युपाफ़सल 26 सी मोनोक्राओफास 36 डब्लू एस सी या 2 किलो करबोरिल मालेसिस का भुरकाव / छिड़काव दो या तीन बार फल पर करें  ।

फली छेदक
मोनोक्रोटोफास 36 डब्लू एस पी सी या क्यासुनाफलफास 25 एस सी एक लीटर, या मैलाथियाफन 50 ई सी सवा लीटर या एन्दोसल्फास 35, 1.25 - 1.5 लीटर या करबोरिल 50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण ढाई किलो प्रति हेक्टेअर के दर से फल आते ही छिड़क दीजिये अथवा एन्डोसल्फान 4 प्रतिशत चूर्ण 20-25 किलो प्रति हेक्टेअर के दर से भुरकें।

उखटा
अरहर की इस प्रमुख बीमारी की रोकथाम रोग रोधी क़िस्मों को बो कर ही की का सकती है उपयुक्त फ़सल चक्र लेकर भी इस रोग से बचा जा सकता है।

अरहर में फली छेदक हेतु समंविर कीट प्रबंधन
फेरोमेन ट्रेप (ट्यूब टाईप 5 ट्रेप प्रति हेक्टेअर ) का प्रयोग अगस्त माह के अंत से फ़सल के पकने तक कीट के सर्वेक्षण अवम नियंत्रण के लिए करें।ट्रेप में लग सकने वाले ल्योकर हर 20 दिन बाद बदलें।4-5 हरी सुंडी / नर पतंगे / फेरोमेन ट्रेप के क्षति स्तर पर आवश्यक नियंत्रण उपाय शुरू करें।

द्वितीय छिड़काव
फूल बनने की प्राम्भिक अवस्था पर अथवा 1 से 2 लट प्रति पौधा पाए जाने के स्तर पर नीम आधारित कीटनाशक नीमगाई एक लीटर प्रति हेक्टेअर के दर से छिड़कव करें।

तृतीय छिड़काव
द्वितीय छिड़काव के एक सप्ताह के अन्तराल पर अंडा परजीवी ट्राइकोगामाकाइलोनिस का 20 लाख अंडे प्रति हेक्टेअर फ़सल पर शाम के समय छोडें।

चौथा छिड़काव
50 प्रतिशत फूल बनने की अवस्था 1-2 लट प्रति पौधा पाए जाने की अवस्था पर न्यूक्लियरपाफलीहाइड्रेसिस वायरस 2250 एल ई 0.01 प्रतिशत (मिली लीटर प्रति लीटर पानी) का छिड़काव शाम या शुबह को करें।

पांचवा छिड़काव
चौथे छिड़काव के 15 दिन के अन्तराल पर दुबारा छिड़काव करे।

कटाई एवं पैदावार

पौधों की फलियाँ पीली पड़ना शुरू हो जाए तथा फलियों में दाना पड़ कर कठोर हो जाए तब अरहर की कटाई करें।जून जुलाई माह में बोई गई अरहर अग्रती फेज नवम्बर - दिसम्बर में पाक जाती है, जबकि देर से पकने वाली फ़सल की कटाई मार्च - अप्रैल तक होती है।उपरोक्त सभी उन्नत कृषि क्रियाओं को अपनाकर अरहर की 20 - 30 क्विंटल प्रति हेक्टेअर उपज ली जा सकती है |

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